बिलासपुर. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के तखतपुर विधानसभा क्षेत्र के ग्राम घुटकू के स्टेशनपारा से सरकारी शिक्षा व्यवस्था की बदहाल तस्वीर सामने आई है. यहां शासकीय प्राथमिक शाला पिछले कई दिनों से खुले आसमान के नीचे पीपल के पेड़ के तले संचालित हो रही है. स्कूल का भवन वर्षों पहले जर्जर हो गया था. जिसके बाद पिछले पांच साल से एक निजी पीएम आवास (इंदिरा आवास) में कक्षाएं लग रही थीं. अब मकान मालिक ने किराया नहीं मिलने और निजी जरूरत के चलते मकान खाली कर ताला लगा दिया, जिससे बच्चे पेड़ के नीचे पढ़ाई करने को मजबूर हैं. हैरानी की बात यह है कि नए स्कूल भवन के निर्माण के लिए अप्रैल 2026 में ही 11.48 लाख रुपये स्वीकृत हो चुके हैं लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों और पंचायत की सुस्ती के कारण निर्माण कार्य आज तक शुरू नहीं हो पाया.
ग्राम घुटकू के स्टेशनपारा स्थित शासकीय प्राथमिक विद्यालय का मूल भवन जर्जर होने के बाद स्कूल को पांच साल पहले एक निजी मकान में शिफ्ट किया गया था. मकान मालिक मुकेश लोनिया ने चार महीने के लिए अपना पीएम आवास उपलब्ध कराया था लेकिन पांच साल बीतने के बाद भी विभाग वैकल्पिक व्यवस्था नहीं कर पाया. आखिरकार मकान मालिक ने अपना घर वापस लेकर उसमें ताला लगा दिया. इसके बाद से बच्चे पीपल के पेड़ के नीचे पढ़ाई कर रहे हैं.
भवन के लिए 11.48 लाख मंजूर
विद्यालय के नए भवन के निर्माण के लिए 23 अप्रैल 2026 को 11.48 लाख रुपये की स्वीकृति मिल चुकी है. बावजूद इसके अब तक निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ. सरपंच का कहना है कि बारिश के बाद निर्माण शुरू कराया जाएगा. ग्रामीणों और पालकों का आरोप है कि अधिकारियों की लापरवाही के कारण बच्चों का भविष्य दांव पर लगा हुआ है.
स्कूल में बचे सिर्फ 10 बच्चे
स्कूल की बदहाल स्थिति का असर प्रवेश पर भी पड़ा है. इस सत्र में पहली और दूसरी कक्षा में एक भी नया दाखिला नहीं हुआ. वर्तमान में स्कूल में केवल 10 छात्र पढ़ रहे हैं. दो शिक्षकों में से एक शिक्षक 30 जुलाई को सेवानिवृत्त होने वाले हैं, जिससे आने वाले समय में पढ़ाई और प्रभावित हो सकती है.
धूप, बारिश और कीड़ों के बीच पढ़ाई
प्रधान पाठिका खगेश्वरी दुबे ने लोकल 18 से कहा कि तेज धूप होने पर या पेड़ से कीड़े गिरने पर कक्षाएं रोकनी पड़ती हैं. बारिश और आंधी के दौरान पढ़ाई कराना संभव नहीं होता. गांव में किसी शोक कार्यक्रम के दौरान भी स्कूल बंद करना पड़ता है क्योंकि पेड़ के नीचे ही कक्षाएं लगती हैं.
शौचालय नहीं, छात्राओं को खुले में जाने की मजबूरी
विद्यालय में शौचालय की सुविधा नहीं है. छात्राओं और महिला शिक्षकों को तालाब की मेड़ पर खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है. किताबों का वितरण भी पेड़ के नीचे किया गया जबकि मध्याह्न भोजन रसोइया के घर में तैयार किया जा रहा है.
शिक्षक बोले- हमारे कंधों पर बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी
सहायक शिक्षक संतराम यादव ने कहा कि स्कूल में न भवन है, न किचन और न ही पहुंचने के लिए ठीक सड़क. पेड़ के नीचे पढ़ाई कराने में हमेशा हादसे का डर बना रहता है. कई बार अधिकारियों को शिकायत की गई लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई.
प्रधान पाठिका ने बताई घटती छात्र संख्या की वजह
प्रधान पाठिका खगेश्वरी दुबे ने बताया कि जब उनकी पोस्टिंग हुई थी, तब स्कूल में करीब 30 बच्चे थे. पुराना भवन भी ऐसी जगह था, जहां नाला पार करके जाना पड़ता था और सड़क भी नहीं थी. लगातार खराब व्यवस्थाओं के कारण बच्चों की संख्या घटती गई और अब सिर्फ 10 छात्र रह गए हैं. पहली और दूसरी कक्षा में एक भी बच्चा नहीं है और इस साल कोई नया प्रवेश भी नहीं हुआ.
पालक बोले- डर के साये में बच्चों को नहीं पढ़ा सकते
टीसी लेने पहुंचीं पालक सीमा लोनिया ने कहा कि पेड़ के नीचे बच्चों को पढ़ाना बेहद खतरनाक है. बारिश, बिजली, सांप-बिच्छू और अन्य हादसों का खतरा हमेशा बना रहता है. उन्होंने कहा कि उनके दो बच्चे इसी स्कूल में पढ़ते हैं लेकिन वह लंबे समय से टीसी मांग रही हैं ताकि बच्चों का दूसरे स्कूल में दाखिला करा सकें.
डीईओ बोले- दूसरी जगह शिफ्ट करेंगे स्कूल
जिला शिक्षा अधिकारी रामेश्वर जायसवाल ने कहा कि नए भवन के लिए अप्रैल में राशि स्वीकृत हो चुकी है लेकिन पंचायत स्तर पर निर्माण शुरू नहीं हुआ. फिलहाल स्कूल को पास के एक भवन में स्थानांतरित करने की व्यवस्था की जा रही है ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो.

